एडीजीपी सुसाइड: सातवें दिन भी नहीं हो सका पोस्टमार्टम, देरी से अटकी जांच, लैपटॉप बना अहम सबूत

परिवार की सहमति न मिलने पर पुलिस अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकती है…

चंडीगढ़: एडीजीपी वाई पूरण कुमार की संदिग्ध आत्महत्या के मामले में जांच लैपटॉप और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बीच उलझ गई है। परिवार की ओर से लगातार सातवें दिन भी पोस्टमार्टम के लिए अनुमति न देने के कारण जांच में अहम साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया रुक गई है, जबकि शव सड़ने की अवस्था में पहुँच चुका है। पुलिस ने सोमवार को परिवार को दूसरी बार पोस्टमार्टम के लिए नोटिस भेजा है। अब संभावना है कि परिवार की अनुमति न मिलने पर पुलिस अदालत का रुख कर सकती है।

लैपटॉप की जांच से खुलेंगे कई राज
जांच एजेंसियों का मानना है कि लैपटॉप की फॉरेंसिक जांच से यह स्पष्ट होगा कि अधिकारी ने आत्महत्या के लिए कोई अन्य तरीका अपनाया था या नहीं। जिस लैपटॉप पर फाइनल नोट टाइप हुआ था, उसे कब्जे में लेकर टाइपिंग और ईमेल की जांच की जाएगी।

• फाइनल नोट पर किए गए हस्ताक्षरों की सीएफएसएल जांच होगी।
• यह पता लगाया जाएगा कि नोट कब और किसने टाइप किया।
• जांच में यह भी देखा जाएगा कि फाइनल नोट किसी को मेल किया गया था या नहीं, और यदि किया गया था तो किन-किन को भेजा गया।
• वसीयत पर 6 अक्तूबर और फाइनल नोट पर 7 अक्तूबर की तारीख दर्ज है, जिसे लेकर भी जांच की जा रही है।

परिवार का इनकार, पुलिस की तफ्तीश रुकी
सूत्रों के अनुसार, परिजनों ने वह लैपटॉप पुलिस को सौंपने से इनकार कर दिया है, जिसमें फाइनल नोट टाइप हुआ था। इस कारण जांच फिलहाल ठप पड़ी हुई है। पुलिस का कहना है कि जांच को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले पोस्टमार्टम रिपोर्ट जरूरी है। रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मौत आत्महत्या थी या किसी अन्य कारण से। पोस्टमार्टम के दौरान विसरा लेकर उसे सेक्टर-36 की लैब में जांच के लिए भेजा जाएगा। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि आत्महत्या से पहले मृतक ने क्या खाया था और क्या किसी अन्य तरीके का इस्तेमाल किया गया था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही जांच की अहम कड़ी
पुलिस सूत्रों ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बिना जांच आगे नहीं बढ़ सकती। रिपोर्ट मिलने के बाद ही एसआईटी तकनीकी और फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी। यदि परिवार सहमति नहीं देता है, तो कानूनी प्रावधानों के तहत पुलिस स्वयं पोस्टमार्टम की प्रक्रिया करवा सकती है ताकि सबूत नष्ट न हों।

कानून देता है पुलिस को अधिकार
सेवानिवृत्त डीएसपी जगबीर सिंह ने बताया कि सीआरपीसी की धारा 174 और 175 के तहत पुलिस मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में परिवार की अनुमति के बिना भी पोस्टमार्टम करा सकती है, खासतौर पर जब साक्ष्यों के नष्ट होने का खतरा हो। चूंकि इस मामले में कई अधिकारियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं में एफआईआर दर्ज की जा चुकी है, इसलिए बीएनएसएस की धारा 194 के तहत पोस्टमार्टम कराना अनिवार्य है। जांच एजेंसियों का कहना है कि लैपटॉप और पोस्टमार्टम रिपोर्ट, दोनों ही इस केस को सुलझाने की सबसे अहम कड़ियाँ साबित होंगी।

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