
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा में विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण), 2025 यानी वीबी-जी राम जी विधेयक पेश कर दिया है। इसके जरिए सरकार ने मनरेगा की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव कर इसे अधिक प्रभावी बनाने का प्रस्ताव रखा है।
लोकसभा में विधेयक के पुनर्प्रस्तुतीकरण के बाद अब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के नाम और इसके नियमों में बदलाव पर चर्चा होगी। संसद की मंजूरी मिलने पर मनरेगा की जगह वीबी-जी राम जी लागू होगा। हालांकि, विधेयक पेश होने से पहले ही विपक्ष ने इसके नाम और प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि नया विधेयक क्या है, इसमें मनरेगा से क्या-क्या बदलाव प्रस्तावित हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों और मजदूरों पर इसका क्या असर पड़ेगा, और विपक्ष क्यों विरोध कर रहा है।
क्या है वीबी-जी राम जी विधेयक?
सरकार का जोर अब ग्रामीणों को केवल रोजगार देने तक सीमित न रहकर गांव-स्तर पर विकास की दिशा तय करने पर है। विधेयक चार प्रमुख प्राथमिकताओं के तहत रोजगार और विकास कार्यों को आगे बढ़ाने की बात करता है.
- जल सुरक्षा: जल संरक्षण ढांचे, सिंचाई सहायता, भूजल पुनर्भरण, जल निकायों का पुनर्जीवन, वॉटरशेड विकास और वनीकरण जैसे कार्यों को बढ़ावा।
- मुख्य ग्रामीण अवसंरचना: ग्रामीण सड़कें, सार्वजनिक भवन, स्कूलों का ढांचा, स्वच्छता प्रणालियां, नवीकरणीय ऊर्जा सुविधाएं और आवास कार्य।
- मौसमी और आपदा-संबंधी कार्य: प्रतिकूल मौसम और आपदा के समय भी रोजगार सुनिश्चित करना, जैसे आश्रय स्थल, तटबंध, बाढ़ प्रबंधन, पुनर्वास और वनाग्नि नियंत्रण।
- आजीविका से जुड़ा अवसंरचना विकास: कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, भंडारण, बाजार, कौशल विकास और सर्कुलर इकोनॉमी से जुड़ी उत्पादक परिसंपत्तियों के माध्यम से आय के अवसर बढ़ाना।
मनरेगा से कैसे अलग होगा वीबी-जी राम जी?
सरकार के मुताबिक, नए नियम मनरेगा की ढांचागत कमियों को दूर करेंगे। प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं—
- रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव।
- सभी ग्रामीण कार्यों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक में शामिल करना।
- एकीकृत राष्ट्रीय ढांचे के जरिए टिकाऊ और उत्पादक ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण।
- 2047 के विकसित भारत लक्ष्य के तहत केंद्र और राज्यों द्वारा साझा योजना निर्माण।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए क्या प्रावधान?
- विकास कार्यों की पहचान ‘विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं’ के माध्यम से स्थानीय स्तर पर।
- ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर से डेटा संकलन के बाद कार्यों का आवंटन।
- ग्राम पंचायतों में साप्ताहिक प्रगति, भुगतान और शिकायतों का सार्वजनिक प्रदर्शन।
- जीपीएस तकनीक, पीएम गति-शक्ति से जुड़ाव और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित गवर्नेंस।
- बायोमेट्रिक सत्यापन, जीपीएस आधारित निगरानी, मोबाइल रिपोर्टिंग, रियल-टाइम डैशबोर्ड, एआई-आधारित विश्लेषण और सशक्त सोशल ऑडिट।
राज्यों की भूमिका और अधिकार
- काम रोकने की अवधि तय करने का अधिकार: राज्य बुवाई-कटाई के चरम मौसम में अधिकतम 60 दिन तक काम रोक सकेंगे।
- खर्च साझा करने का नियम: पूर्वोत्तर/हिमालयी राज्यों के लिए 90:10, अन्य राज्यों के लिए 60:40 (केंद्र:राज्य) फंडिंग मॉडल।
- नॉर्मेटिव आवंटन: राज्यों द्वारा जिलों और पंचायतों में जरूरत के अनुसार फंड का पारदर्शी वितरण।
किसानों और मजदूरों को क्या लाभ?
- खेती के पीक सीजन में मजदूरों की उपलब्धता बनी रहेगी।
- मजदूरों को अन्य स्रोतों से आय के अवसर मिलेंगे।
- किसानों पर अतिरिक्त मजदूरी लागत का दबाव कम होगा।
- काम के दिन बढ़ने से मजदूरों की आय में वृद्धि।
क्या मजदूरी दरें बदलेंगी?
फिलहाल मजदूरी दरों में बदलाव का प्रावधान नहीं है। नई दरें अधिसूचित होने तक मौजूदा मनरेगा दरें लागू रहेंगी। 15 दिनों में काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता पहले की तरह राज्य सरकारें देंगी।
बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार का कहना है कि हाल के वर्षों में अनियमितताएं सामने आई हैं, कागजी कार्य, मशीनों का गलत इस्तेमाल, फंड दुरुपयोग और कम घरों द्वारा 100 दिन का काम पूरा किया जाना। इन्हीं कारणों से पारदर्शिता और निगरानी बढ़ाने के लिए नया ढांचा प्रस्तावित है।
पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी?
- एआई आधारित निगरानी, जीपीएस और मोबाइल ट्रैकिंग।
- केंद्र और राज्य स्तर पर स्टीयरिंग कमेटियां।
- साप्ताहिक सार्वजनिक खुलासा और साल में दो बार सख्त सोशल ऑडिट।
विपक्ष का विरोध क्यों?
विपक्ष का आरोप है कि नाम बदलना अनावश्यक है और अधिकार-आधारित गारंटी की आत्मा कमजोर की जा रही है। कांग्रेस और वाम दलों का कहना है कि इससे राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा, केंद्र का नियंत्रण बढ़ेगा और मजदूरों के अधिकार प्रभावित होंगे। महात्मा गांधी का नाम हटाने और डिजिटल अनिवार्यताओं को भी विपक्ष ने आपत्तिजनक बताया है।
वीबी-जी राम जी विधेयक मनरेगा को व्यापक विकास और डिजिटल गवर्नेंस से जोड़ने की कोशिश है, लेकिन इसके नाम, फंडिंग ढांचे और अधिकार-आधारित प्रकृति को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। आने वाले समय में संसद की चर्चा और निर्णय से ही इसकी अंतिम दिशा तय होगी।







