
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2023 में वन संरक्षण कानून में किए गए संशोधनों के जरिए जंगलों के प्रबंधन का निजीकरण शुरू कर दिया गया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से कड़े सवाल किए हैं। कांग्रेस का कहना है कि 2023 में वन संरक्षण कानून में किए गए बदलाव देश में वन प्रबंधन को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में कदम हैं, जो राष्ट्रीय वन नीति और पर्यावरण संरक्षण के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। पार्टी के महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर 2 जनवरी को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी एक सर्कुलर साझा करते हुए यह आरोप लगाया।
कानून में व्यापक बदलाव
जयराम रमेश के अनुसार, अगस्त 2023 में मोदी सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में संशोधन को जल्दबाजी में संसद से पारित कराया। इसके तहत न केवल कानून का नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम किया गया, बल्कि जंगलों के संचालन और प्रबंधन से जुड़े नियमों में भी बड़े और दूरगामी परिवर्तन किए गए। उन्होंने कहा कि उसी समय यह आशंका जताई गई थी कि इन संशोधनों से निजी संस्थाओं को जंगलों में प्रवेश का रास्ता मिल जाएगा, जिसे अब मंत्रालय के सर्कुलर ने स्पष्ट कर दिया है। जयराम रमेश ने चेतावनी दी कि यह प्रक्रिया अभी शुरुआत भर है और आगे चलकर इससे जंगलों के व्यावसायिक इस्तेमाल को और बढ़ावा मिल सकता है। कांग्रेस का आरोप है कि ऐसे कदमों से पर्यावरण संरक्षण की मूल भावना कमजोर पड़ेगी।
मंत्रालय के सर्कुलर में क्या कहा गया है
सर्कुलर के मुताबिक, यदि राज्य सरकारें सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर प्राकृतिक पुनरुत्पादन, वृक्षारोपण या वन प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियां कराती हैं, तो इन्हें वन गतिविधि माना जाएगा। ऐसी स्थिति में प्रतिपूरक वनीकरण और नेट प्रेजेंट वैल्यू के भुगतान जैसी शर्तें लागू नहीं होंगी। इसके अलावा, राज्य सरकारों को इन गतिविधियों से प्राप्त राजस्व के वितरण और हिस्सेदारी का ढांचा तय करने का अधिकार भी दिया गया है, जिससे जंगलों के व्यावसायिक और निजी प्रबंधन का रास्ता खुलने का कांग्रेस ने आरोप लगाया है।





