
मंगलवार को लोकसभा में उस वक्त सियासी हलचल तेज हो गई, जब विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दाखिल किया। नोटिस मिलते ही स्पीकर ओम बिरला ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए लोकसभा सचिवालय को तत्काल आवश्यक कार्रवाई के निर्देश जारी किए।
विपक्षी दलों द्वारा पेश किए गए इस अविश्वास प्रस्ताव पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, वाम दल और राष्ट्रीय जनता दल सहित कुल 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। यह नोटिस लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह को सौंपा गया। प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 94(सी) और लोकसभा के नियम 94(सी) के तहत दाखिल किया गया है। इस बीच, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा ने विपक्ष पर जॉर्ज सोरोस के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। नोटिस मिलने के करीब एक घंटे के भीतर ही स्पीकर ओम बिरला ने लोकसभा सचिवालय को निर्देश दिया कि नोटिस की विधिक जांच कर प्रक्रिया में तेजी लाई जाए। यह आदेश लिखित रूप में जारी किया गया, जिससे स्पष्ट है कि स्पीकर इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। ओम बिरला ने यह भी साफ किया है कि जब तक उन्हें हटाने संबंधी प्रस्ताव पर कोई निर्णय नहीं हो जाता, तब तक वे लोकसभा की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे।
नोटिस के बाद आसन पर नहीं आए स्पीकर
लोकसभा महासचिव को नोटिस सौंपे जाने के बाद ओम बिरला ने स्वयं को सदन के संचालन से अलग कर लिया। मंगलवार को वे लोकसभा की कार्यवाही संचालित करने के लिए आसन पर उपस्थित नहीं हुए। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि लोकसभा में हो रहा हंगामा विपक्ष की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश में अस्थिरता पैदा करना है। पात्रा ने दावा किया कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से राहुल गांधी, कांग्रेस और उनके सहयोगी दल जॉर्ज सोरोस के इशारों पर काम कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, लोकसभा स्पीकर व प्रधानमंत्री जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले कर रहे हैं। बजट सत्र के दौरान स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की पृष्ठभूमि में आए इस बयान में पात्रा ने विपक्ष को लोकतंत्र विरोधी बताया। बीजेपी ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर साझा किया, जो तेजी से वायरल हो रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि स्पीकर ओम बिरला लोकसभा की कार्यवाही को खुलेआम पक्षपातपूर्ण तरीके से चला रहे हैं। उनका कहना है कि विपक्षी सांसदों, विशेषकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा। प्रस्ताव में हाल की घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जिनमें धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी का भाषण रोका जाना और आठ विपक्षी सांसदों का निलंबन शामिल है। विपक्ष का दावा है कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है और उनकी आवाज दबाई जा रही है।
बजट सत्र में जारी गतिरोध
यह घटनाक्रम बजट सत्र के दौरान लोकसभा में बार-बार हो रहे व्यवधान, स्थगन और नारेबाजी के बीच सामने आया। राहुल गांधी द्वारा पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की पुस्तक से भारत-चीन संबंधों पर अंश पढ़ने की कोशिश के बाद विवाद और बढ़ गया। स्पीकर ने कहा कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री की सीट की ओर बढ़ सकते थे, इसी कारण पीएम मोदी का संबोधन रद्द करना पड़ा। विपक्ष ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। उल्लेखनीय है कि 22 वर्षों में पहली बार राष्ट्रपति का अभिभाषण प्रधानमंत्री के जवाब के बिना पारित हुआ।
प्रस्ताव दाखिल करने वाले प्रमुख सांसद
अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस कांग्रेस सांसद के. एस. सुरेश, गौरव गोगोई और मोहम्मद जावेद ने जमा किया। परंपरा के अनुसार, लोकसभा में विपक्ष के नेता होने के कारण राहुल गांधी ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।




