
सामने आए ये चार प्रमुख लक्षण
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में बच्चों और महिलाओं के बीच साइकोजेनिक सिंड्रोम के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। यह बीमारी मिर्गी जैसी प्रतीत होती है, लेकिन वास्तव में यह मिर्गी नहीं होती।
पूर्वांचल और बिहार के 10 से ज्यादा जिलों में इस समस्या का दायरा बढ़ता जा रहा है। चिकित्सकीय भाषा में इसे पीएनईएस (साइकोजेनिक नॉन-एपिलेप्टिक सिंड्रोम) कहा जाता है। बीएचयू अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग की ओपीडी में हर महीने इस बीमारी से पीड़ित करीब 200 मरीज अपने परिजनों के साथ इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इन मरीजों में आठ साल के बच्चे से लेकर 35 वर्ष तक की महिलाएं शामिल हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इन मरीजों में मिर्गी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, लेकिन जांच में मिर्गी की पुष्टि नहीं होती। यह समस्या अक्सर मानसिक आघात, तनाव, अवसाद या तंत्रिका तंत्र से जुड़ी मनोवैज्ञानिक वजहों के कारण उत्पन्न होती है। न्यूरोलॉजिस्ट के अनुसार, करीब दो साल पहले तक सप्ताह में 10 से 20 मरीज ही इस समस्या के साथ आते थे, लेकिन पिछले एक वर्ष में यह संख्या बढ़कर लगभग 50 प्रति सप्ताह तक पहुंच गई है। बिहार के भभुआ, सासाराम, औरंगाबाद, कैमूर और बक्सर के अलावा उत्तर प्रदेश के देवरिया, मऊ, सोनभद्र, मिर्जापुर, गाजीपुर और जौनपुर समेत कई जिलों से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार में पीएनईएस के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसके कारणों, रोकथाम और उपचार के नए तरीकों पर काम किया जा रहा है। इसी कड़ी में 7 और 8 मार्च को आईएमएस-बीएचयू में एक विशेष बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें केरल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सहित देश के कई संस्थानों से मनोचिकित्सक, न्यूरोलॉजिस्ट और मनोवैज्ञानिक भाग लेंगे। बैठक में इस बीमारी की पहचान, कारण और उपचार पद्धतियों पर विस्तृत चर्चा होगी, खासतौर पर महिलाओं और बच्चों में बढ़ते मामलों पर विशेष मंथन किया जाएगा।
साइकोजेनिक सिंड्रोम के प्रमुख लक्षण
इस सिंड्रोम में मरीजों में मिर्गी जैसे कुछ लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे—
• शरीर में कंपन या ऐंठन होना
• कुछ समय के लिए बेहोशी जैसा महसूस होना
• सामान्य स्थिति में हाथ-पैर पटकना या झटके आना
• देखने में मरीज बेहोश लगे, लेकिन पूरी तरह अचेत न हो
थेरेपी और काउंसिलिंग से मिलता है लाभ
साइकोजेनिक सिंड्रोम (पीएनईएस) का उपचार मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक थेरेपी के जरिए किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार बिहेवियर थेरेपी और कॉग्निटिव थेरेपी इस समस्या में काफी कारगर साबित हो रही हैं। इसके साथ ही मरीजों की नियमित साइकोलॉजिकल काउंसिलिंग भी की जाती है। इस प्रक्रिया में मनोचिकित्सा, मनोविज्ञान और न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों की संयुक्त टीम शामिल रहती है।
गाजीपुर की 24 वर्षीय युवती को शादी के करीब डेढ़ महीने बाद मिर्गी जैसे झटके आने लगे थे। परिजनों ने पहले इसे मिर्गी समझकर इलाज कराया, लेकिन जब कोई लाभ नहीं हुआ तो वे बीएचयू के न्यूरोलॉजी ओपीडी पहुंचे। जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि यह पीएनईएस के लक्षण हैं। युवती ने बताया कि पारिवारिक तनाव और कलह के कारण उसे मानसिक आघात पहुंचा था, जिसके बाद डॉक्टरों ने उसे बिहेवियर थेरेपी लेने की सलाह दी। इसी तरह बिहार के बक्सर की 28 वर्षीय महिला को बार-बार हाथ-पैरों में झनझनाहट और झटके जैसा महसूस होता था। परिवार के अनुसार यह समस्या अचानक सामने आती थी। बीएचयू में काउंसिलिंग के दौरान शुरुआत में महिला जवाब देने में झिझक रही थी, लेकिन बाद में उसने बताया कि बचपन में उसके सिर पर गंभीर चोट लगी थी। अब जब भी झटका आता है, तो परिवार के लोग घबरा जाते हैं। फिलहाल डॉक्टर उसकी नियमित काउंसिलिंग और थेरेपी कर रहे हैं।






