मात्र एक वोट के बेहद मामूली अंतर से मिली हार के बाद डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री के.आर. पेरियाकरुप्पन ने न्यायालय का रुख किया है। पोस्टल बैलेट में कथित गड़बड़ी के आरोपों के बीच अब इस मामले की सुनवाई 10 मई को प्रस्तावित है, जो यह तय करेगी कि टीवीके उम्मीदवार श्रीनिवास सेतुपति विधायक के रूप में शपथ लेंगे या फिर तिरुपत्तूर सीट पर दोबारा मतगणना कराई जाएगी। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद इस सीट को लेकर राजनीतिक सरगर्मी और कानूनी संघर्ष दोनों तेज हो गए हैं। मद्रास उच्च न्यायालय इस महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है, जिसे पेरियाकरुप्पन ने दायर किया है। उन्होंने तिरुपत्तूर विधानसभा सीट से टीवीके प्रत्याशी श्रीनिवास सेतुपति की जीत को चुनौती देते हुए अदालत से मांग की है कि उन्हें फिलहाल विधायक पद की शपथ लेने से रोका जाए।

शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर सीट पर इस बार बेहद कांटे की टक्कर देखने को मिली। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, टीवीके उम्मीदवार श्रीनिवास सेतुपति को 83,365 वोट प्राप्त हुए, जबकि डीएमके के पेरियाकरुप्पन को 83,364 वोट मिले। इस तरह जीत का अंतर सिर्फ एक वोट रहा, जो राज्य के चुनावी इतिहास की सबसे करीबी और रोमांचक मुकाबलों में से एक माना जा रहा है। पेरियाकरुप्पन ने इस परिणाम को संदिग्ध बताते हुए मतगणना प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। अपनी याचिका में पेरियाकरुप्पन ने विशेष रूप से पोस्टल बैलेट को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर सीट के पोस्टल बैलेट गलती से किसी अन्य विधानसभा क्षेत्र में भेज दिए गए, जिससे मतगणना प्रभावित हुई। उन्होंने अदालत से अपील की है कि इन कथित रूप से गुम हुए मतपत्रों को खोजकर वापस लाया जाए और उनकी पुनर्गणना कराई जाए। साथ ही, उन्होंने मतगणना की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने और उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश देने की भी मांग की है।
यह मामला राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बन गया है, क्योंकि तमिलनाडु में टीवीके इस बार सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है और सरकार गठन की दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में एक-एक सीट का महत्व निर्णायक हो गया है। न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी और न्यायमूर्ति एन. सेंथिलकुमार की अवकाशकालीन पीठ 10 मई को सुबह 10:30 बजे इस याचिका पर सुनवाई करेगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इतने कम अंतर वाले इस परिणाम पर अदालत का फैसला राज्य की राजनीतिक स्थिति और सरकार गठन की प्रक्रिया पर भी प्रभाव डाल सकता है।







