आभानेरी और भानगढ़

“पधारो म्हारे देस” की परंपरा पर चलने वाला तथा हर सैलानी को आदर और सम्मान से पूजने वाला राजस्थान, भारत में गौरव का प्रतीक है। देश विदेश से लोग यहाँ पर घूमने आते हैं, और यहाँ की संस्कृति के बारे में काफी कुछ सीख कर जाते हैं। यूँ तो राजस्थान में कई पर्यटन क्षेत्र हैं, परन्तु हम आभानेरी और भानगढ़ को इन सबसे अलग करके देख सकते हैं। कारण है कि इसका इतिहास जो दूसरों से काफी अलग है। आइये जानते हैं आभानेरी और भानगढ़ के बारे में कुछ विशेष बातें जिससे आप निश्चिंत होकर वहाँ जा सकें:

आभानेरी:

जब भी छुट्टी होती है, आप हमेशा एक नई जगह पर जाने के लिए उत्सुक होते हैं। आज हमारी यात्रा की चर्चा का विषय है आभानेरी। राजस्थान के दौसा जिले में एक छोटा सा गाँव है आभानेरी, जो जयपुर से केवल 95 कि.मी. दूर है।

देवी हर्षत माता के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ‘आभा’ की छड़ी को उस जगह पर लहराया था, इस तरह, यह ‘चमक का शहर’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। आपको यह जानना आश्चर्य होगा कि आभानेरी का वास्तविक उच्चारण ‘आभा नगरी’ था, जो समय के साथ बदलकर आभानेरी हो गया।

गुर्जर साम्राज्य के राजा चंद ने गर्व से 9 वीं शताब्दी में एक सुंदर स्थान का निर्माण किया था, जो लगभग तीन हजार साल पुराना है, लेकिन अभी भी दर्शनीय है। चांद बाबडी हो, हर्षत माता मंदिर या फिर यहाँ के आकर्षक लोक नृत्य, सभी अपने आप मे आकर्षक है।

आभानेरी घूमने का सबसे अच्छा समय:

यदि आप रिमझिम बारिश से प्यार करते हैं, तो जून से सितंबर तक के महीनों को आभानेरी की यात्रा के लिए अपने कैलेंडर पर टिक किया जा सकता है। यदि नहीं, तो अक्टूबर से मार्च तक का समय अच्छा होता है क्योंकि इन महीनों में यहाँ का मौसम ठंडा होता है।

आभानेरी तक कैसे पहुंचे: आइये आभानेरी गांव में आपका स्वागत है। आभानेरी जयपुर-आगरा राजमार्ग पर दौसा मुख्यालय से 30 किमी तथा जयपुर से 90 किमी दूर है। यहाँ का निकटतम बस और रेलवे स्टेशन दौसा है।

हवाई मार्ग; हवाई मार्ग से आभानेरी पहुँचने के लिए निकटतम एयरपोर्ट जयपुर में है। जहाँ से आप आसानी से टैक्सी या बस के माध्यम से आभानेरी जा सकते हैं।

सड़क मार्ग: सड़क मार्ग से आभानेरी पहुँचने के लिए निकटतम दौसा मुख्यालय से दिल्ली, जयपुर, अजमेर, आगरा, अलवर, बीकानेर और भरतपुर के बीच अक्सर बसें हैं।

रेल मार्ग; रेल मार्ग द्वारा आभानेरी पहुँचने के लिए निकटतम दौसा रेलवे स्टेशन है, जहाँ से जयपुर, आगरा, अहमदाबाद सहित कई अन्य शहरों के लिए रेल सेवा उपलब्ध है।

आभानेरी का प्रमुख आकर्षण:

इस जगह का मुख्य आकर्षण है चांद बाबडी, हर्षत माता मंदिर है। यहाँ के लोक नृत्य, जैसे घूमर, कालबेलिया और भवाई पर्यटकों के लिए लोकप्रिय हैं। ये सब आपकी छुट्टियों को यादगार बना देंगी।

भानगढ़:

जयपुर-आगरा मार्ग पर दौसा ज़िले से 30 कि.मी. की दूरी पर स्थित भानगढ़, जहाँ दौसा तथा जयपुर से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है भानगढ़, जयपुर तथा अलवर से 90 किमी दूर है, तथा यहाँ का निकटतम बस और रेलवे स्टेशन दौसा है। हवाई मार्ग से भानगढ़ पहुँचने के लिए निकटतम एयरपोर्ट जयपुर में है। जहाँ से आप आसानी से टैक्सी या बस के माध्यम से भानगढ़ जा सकते हैं।

क्या देखें:

भानगढ़ राजस्थान के अलवर ज़िले में ‘सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान’ के पास स्थित एक खंडहर है। किसी समय यह स्थान राजपूती आन, बान और शान का प्रतीक हुआ करता था। कहने को यहाँ बाज़ार, गलियाँ, हवेलियाँ, महल, कुएँ और बावड़िया तथा बाग़-बगीचे आदि सब कुछ था, लेकिन अब यहाँ सब के सब खंडहर हैं। जैसे सब कुछ एक ही रात में सब कुछ उजड़ गया हो। पूरे किले में एक भी जगह ऐसी नहीं है, जिस पर छत हो, लेकिन मंदिरों के शिखर आत्ममुग्ध खड़े दिखाई देते हैं। हर दीवार में पड़ी दरारें अतीत के भयावह पंजों से खंरोची हुई लगती हैं। विनाश के इन्हीं चिन्हों ने सदियों से यहाँ की हवाओं में एक अफवाह घोल रखी है कि यह स्थान शापित है, तथा यहाँ पर भूत-पिशाचों का वास है।

इतिहास:

हर ऐतिहासिक जगह का कुछ न कुछ इतिहास होता है। ठीक उसी तरह भानगढ़ का भी इतिहास है। भानगढ़ का महल आमेर के राजा भगवानदास ने 1573 ई. में बनवाया था। भगवानदास ने पूरी योजना के साथ इस नगर का निर्माण कराया था। बाद में 1605 ई. तक माधोसिंह ने यहाँ आकर अपना राज जमाया और भानगढ़ को राजधानी बना लिया। राजा मानसिंह के भाई माधोसिंह अकबर के दरबार में दीवान थे। माधोसिंह के तीन पुत्र थे- तेजसिंह, छत्रसिंह और सुजानसिंह। माधोसिंह के बाद छत्रसिंह भानगढ़ के शासक बने।

वर्ष 1630 ई. में एक युद्ध के दौरान युद्ध मैदान में ही छत्रसिंह की मृत्यु हो गई। बिना शासक के भानगढ़ की रौनक घटने लगी। तत्पश्चात् छत्रसिंह के पुत्र अजबसिंह ने भानगढ़ के पास ही नया नगर बसाया और वहीं रहने लगा। यह नगर अजबगढ़ था। लेकिन अजबसिंह का पुत्र हरिसिंह भानगढ़ में ही रहा। मुग़लों के बढ़ते प्रभाव के चलते संरक्षण के लिए हरिसिंह के दो बेटे औरंगज़ेब के समय मुसलमान बन गए और भानगढ़ पर राज करने लगे। आमेर के कछवाहा शासकों को यह गवारा नहीं था। मुग़लों के कमज़ोर पड़ने पर सवाई जयसिंह ने वर्ष 1720 ई. में इन्हें मारकर भानगढ़ पर क़ब्ज़ा कर लिया और भानगढ़ को अपनी रियासत में मिला लिया। लेकिन इलाके में पानी की कमी के चलते यह शहर आबाद नहीं रह सका और 1783 ई. के अकाल ने इस महल को पूरी तरह उजाड़ दिया। साथ ही वक्त की मार ने इसकी शक्ल भुतहा कर दी।

भानगढ़ पर्यटन:

राजस्थान की यात्रा करने वाले और इस स्थान के बारे में मामूली जानकारी रखने वाले पर्यटक इस किले तक नहीं पहुँच पाते हैं। चूंकि इस जगह की कहानियां डरावनी हैं। इस किले के पास रात में कोई नहीं रुकता है। सरकार द्वारा यहाँ रात में रुकने की इजाजत नहीं है इसलिए यहाँ पर आपको शाम तक ही घूमने की अनुमति मिलती है।

भानगढ़ घूमने का सबसे अच्छा समय:

भानगढ़ किले को घूमने की अनुमति सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक है, अर्थात सूर्यास्त से पहले और सूर्योदय के बाद। इसलिए, भानगढ़ किले के खुलने के समय पर ध्यान दें, रात में वहाँ जाने से मना कर दें। आप हल्की ठंड में ही भानगढ़ किले को घूमने जाएं क्योंकि गर्मियों में वहाँ काफी मुश्किल होती है।

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