सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष कपिल सिब्बल और कार्यकारी समिति के अन्य सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव में उस स्थान पर प्रस्तावित संग्रहालय पर भी आपत्ति जताई गई है, जहां उन्होंने बार के सदस्यों के लिए कैफे-लाउंज बनाने की मांग की थी। एससीबीए ने सुप्रीम कोर्ट के प्रतीक चिह्न ‘न्याय की देवी’ की प्रतिमा में किए गए आमूलचूल बदलावों पर आपत्ति जताई है और इस बदलाव के खिलाफ सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों के पुस्तकालय में न्याय की देवी की छह फुट ऊंची नई प्रतिमा लगाई गई है, जिसमें एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवार की जगह संविधान है। इस नई प्रतिमा में न्याय की देवी ने सफेद पारंपरिक पोशाक पहनी है, आंखों पर पट्टी नहीं है, और सिर पर मुकुट है।
एससीबीए ने प्रस्ताव में कहा कि बार से परामर्श किए बिना किए गए इन बदलावों के पीछे के कारणों से वे अनजान हैं, जबकि वे न्यायिक प्रक्रिया में बराबरी के हिस्सेदार हैं। साथ ही, एससीबीए ने उच्च सुरक्षा क्षेत्र में प्रस्तावित संग्रहालय का विरोध किया और बार के सदस्यों के लिए पुस्तकालय और कैफे-लाउंज की मांग दोहराई। उनका कहना है कि वर्तमान कैफेटेरिया बार के सदस्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं है, और संग्रहालय के लिए काम शुरू होने पर भी उन्हें चिंता है, जबकि उनकी आपत्ति अभी बनी हुई है।
‘लेडी जस्टिस’ (न्याय की देवी) का इतिहास पौराणिक कथाओं और न्याय की ग्रीक देवी ‘जस्टिशिया’ से जुड़ा है। उसकी आंखों पर पट्टी न्याय और निष्पक्षता का प्रतीक है, जबकि तलवार कानून की शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। दुनिया भर में ‘लेडी जस्टिस’ की कई मूर्तियां और चित्र हैं, जिनमें सभी में उसे आंखों पर पट्टी बंधी हुई नहीं दिखाया गया है। विद्वानों का मानना है कि उसकी आंखों पर पट्टी बाद में जोड़ी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में ‘न्याय की देवी’ की नई प्रतिमा, बार एसोसिएशन ने जताई नाराजगी




