अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को राहत देते हुए पासपोर्ट आवेदन में लिंग चयन से जुड़ी नई नीति लागू करने की अनुमति दे दी है। अब आवेदक अपने पासपोर्ट में केवल “पुरुष” या “महिला” के रूप में ही लिंग का चयन कर सकेंगे। कोर्ट के इस फैसले का तीन न्यायाधीशों ने विरोध किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी जीत मानी जा रही है। अदालत ने न्याय विभाग के उस अनुरोध को स्वीकार किया, जिसमें निचली अदालत द्वारा नीति पर लगाई गई रोक को हटाने की मांग की गई थी। कोर्ट के निर्णय के बाद अब पासपोर्ट पर केवल जन्म के समय दर्ज लिंग को ही मान्य माना जाएगा।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह नीति ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ भेदभाव करती प्रतीत नहीं होती। कोर्ट के मुताबिक, पासपोर्ट में जन्म के समय निर्धारित लिंग का उल्लेख करना उतना ही तथ्यात्मक है, जितना किसी व्यक्ति के जन्म देश का उल्लेख करना। यह समान सुरक्षा सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करता।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के तीन लिबरल जजों ने इस फैसले का सार्वजनिक रूप से विरोध किया। उनका कहना है कि पासपोर्ट में केवल जन्म के समय के लिंग का उल्लेख करने से ट्रांसजेंडर लोगों के प्रति हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
जनवरी में ट्रंप ने जारी किया था आदेश
ध्यान देने योग्य है कि इसी साल जनवरी में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया था, जिसके बाद विदेश विभाग ने पासपोर्ट नियमों में बदलाव करते हुए घोषणा की थी कि अमेरिका जन्म प्रमाणपत्र के आधार पर केवल दो लिंगों पुरुष और महिला को ही मान्यता देगा। इस आदेश के खिलाफ अभी भी एक क्लास एक्शन मुकदमा जारी है।
ट्रंप प्रशासन का ट्रांसजेंडर समुदाय पर बड़ा असर: पासपोर्ट में अब केवल ‘पुरुष’ या ‘महिला’ का विकल्प मिलेगा






