
केंद्र सरकार ने आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरों के वादन या गायन को अनिवार्य करने संबंधी निर्देश जारी किए हैं। इस फैसले पर कुछ मुस्लिम संगठनों और समुदाय के नेताओं ने आपत्ति जताई है। इस मुद्दे पर मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि वे जान दे सकते हैं, लेकिन राष्ट्रगीत की कुछ विशेष पंक्तियों का पाठ नहीं करेंगे।
सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ को अब राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के समान सम्मान देना आवश्यक होगा। प्रोटोकॉल के तहत सभी सरकारी आयोजनों में राष्ट्रगीत के पूरे छह छंद गाए या बजाए जाएंगे। इस निर्णय के बाद कुछ मुस्लिम नेता विरोध में सामने आए हैं। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने स्पष्ट किया कि वे सभी छंदों के गायन के पक्ष में नहीं हैं और कुछ पंक्तियों पर आपत्ति जताई है।
समाचार एजेंसी से बातचीत में रशीदी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ 1937 से विवाद का विषय रहा है। उनके अनुसार उस समय प्रमुख नेताओं ने कांग्रेस को पत्र लिखकर बताया था कि गीत की कुछ पंक्तियां मुस्लिम समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं हैं, जिसके बाद प्रस्ताव पारित कर उन अंशों को हटाया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि 2016 में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले में स्पष्ट किया गया था कि ‘वंदे मातरम्’ के दौरान खड़ा न होने वाले व्यक्ति को देशद्रोही नहीं माना जा सकता। रशीदी का मत है कि जिन पंक्तियों में देश को देवी स्वरूप संबोधित किया गया है, वे उनकी धार्मिक आस्था के विरुद्ध हैं। उनका कहना है कि मुसलमान अपनी आस्था से समझौता नहीं करेंगे, भले ही उन्हें किसी दबाव का सामना करना पड़े।
इसी विषय पर एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि वे ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान करते हैं, लेकिन किसी को इसे बोलने के लिए बाध्य करना असंवैधानिक है। उनका आरोप है कि कुछ संगठन यह संदेश देते हैं कि जो ‘वंदे मातरम्’ नहीं बोलेगा, वह देशविरोधी है, जबकि यह सही नहीं है। उन्होंने कहा कि वे राष्ट्रगान को सम्मानपूर्वक गाते हैं और ऐसे मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है।





