कर्ज के बोझ तले दबता बांग्लादेश: बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज में , टैक्स वसूली घटी

बांग्लादेश इस समय गंभीर आर्थिक दबाव से गुजर रहा है। देश के राष्ट्रीय राजस्व बोर्ड (एनबीआर) के चेयरमैन एम. अब्दुर रहमान खान ने चेतावनी देते हुए कहा कि बांग्लादेश अब ‘कर्ज के जाल’ में फंस चुका है। उनके मुताबिक, टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात जो पहले 10% से अधिक था, अब घटकर लगभग 7% पर आ गया है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। ढाका में आयोजित एक सेमिनार में उन्होंने कहा, “हम कर्ज के जाल में पहले ही फंस चुके हैं। जब तक इसे स्वीकार नहीं करेंगे, समाधान नहीं मिल सकता।” सरकार की आय के मुकाबले कर्ज चुकाने का दबाव इतना बढ़ गया है कि यह बजट का दूसरा सबसे बड़ा खर्च बन गया है। थिंक-टैंक सीपीडी के अर्थशास्त्री मुस्तफिजुर रहमान ने बताया कि पहले किसान कल्याण, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा बजट में दूसरे सबसे बड़े मद होते थे, लेकिन अब उनकी जगह कर्ज के ब्याज ने ले ली है। यह स्थिति साफ बताती है कि देश की वित्तीय हालत तनाव में है।
वित्त सचिव एम. खैरुज्जमान मोजुम्दार के अनुसार, इस वर्ष बांग्लादेश का राष्ट्रीय बजट इतिहास में पहली बार घटाया गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “यह वैसा ही है जैसे पहले से अत्यधिक दुबले व्यक्ति को और वजन घटाने को कहा जाए।” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह दबाव जारी रहा तो विकास की रफ्तार थम सकती है और अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर हो सकती है।
विश्व बैंक की ‘इंटरनेशनल डेब्ट रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में बांग्लादेश का बाहरी कर्ज 42% बढ़कर 104.48 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। बाहरी कर्ज अब देश के कुल निर्यात के 192% के बराबर हो चुका है और निर्यात से होने वाली आमदनी का 16% केवल कर्ज चुकाने में खर्च हो रहा है। दक्षिण एशिया में तेजी से बढ़ते कर्ज दबाव वाले देशों में बांग्लादेश और श्रीलंका शामिल हैं। बांग्लादेश बैंक के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ छह महीनों में डिफॉल्ट लोन टीके 2.24 लाख करोड़ बढ़ गए हैं, जिससे कुल फंसा हुआ कर्ज टीके 6.44 लाख करोड़ पर पहुंच गया। यह बैंकिंग सिस्टम के कुल क्रेडिट का 35.7% है, जो प्रशासनिक खामियों और वित्तीय अव्यवस्था की ओर इशारा करता है।
स्थानीय अखबार प्रोथोम आलो के अनुसार, निवेश में इतनी गिरावट पहले कभी नहीं देखी गई। इसके पीछे राजनीतिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट, ऊँची ब्याज दरें, महंगाई, कम वेतन और घटती क्रय क्षमता जैसे कारण बताए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संकट से निकलने का रास्ता टैक्स बढ़ाने, कर्ज प्रबंधन को कड़ा करने और बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने में है।

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