भारतीय बच्चों में बढ़ते कैंसर के मामले; एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती, हर साल 50 हजार बच्चे हो रहे हैं शिकार

इंटरनेशनल चाइल्डहुड कैंसर डे का उद्देश्य
वैश्विक स्तर पर बच्चों में कैंसर की रोकथाम, इससे प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों की चुनौतियों को समझने तथा समाज में सहयोग और संवेदनशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 15 फरवरी को इंटरनेशनल चाइल्डहुड कैंसर डे मनाया जाता है। भारत में बच्चों के बीच कैंसर के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में हर साल करीब 50 हजार नए कैंसर के मामले सामने आते हैं, जो देश में कुल कैंसर मामलों का लगभग 3 से 5 प्रतिशत है। बच्चों में कैंसर को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर वर्ष 15 फरवरी को इंटरनेशनल चाइल्डहुड कैंसर डे मनाया जाता है।
कैंसर आज दुनियाभर में तेजी से फैलने वाली सबसे गंभीर और जानलेवा बीमारियों में से एक बन चुका है। आमतौर पर यह धारणा रही है कि कैंसर युवाओं या वयस्कों को अधिक प्रभावित करता है, लेकिन हाल के वर्षों में बच्चों में बढ़ते कैंसर के मामलों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। खराब जीवनशैली, पर्यावरण प्रदूषण, असंतुलित खानपान, रसायनों के संपर्क और आनुवांशिक कारणों को बच्चों में कैंसर के लिए प्रमुख जिम्मेदार माना जा रहा है। कम उम्र में होने वाला कैंसर बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक और सामाजिक विकास पर भी गहरा असर डालता है।
भारत में बच्चों में कैंसर के आंकड़े
आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में हर साल 50 हजार से अधिक बच्चे कैंसर से प्रभावित पाए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में कैंसर वयस्कों से अलग प्रकृति का होता है और कई बार इसका पता अचानक चलता है।
- बच्चों में सबसे अधिक ल्यूकेमिया (करीब 40%), लिम्फोमा और ब्रेन ट्यूमर के मामले सामने आते हैं।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनियाभर में 0 से 19 वर्ष की आयु के लगभग 2.75 लाख बच्चों और किशोरों में कैंसर का पता चला।
- इसी अवधि में करीब 1.05 लाख बच्चों की कैंसर से मौत हुई, हालांकि वास्तविक आंकड़े इससे अधिक हो सकते हैं क्योंकि कई देशों में बच्चों में कैंसर की पहचान समय पर नहीं हो पाती।
- विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में कैंसर का संबंध अधिकतर आनुवांशिक कारणों और इम्यून सिस्टम से होता है, न कि जीवनशैली से।
भारतीय बच्चों में कैंसर के बाद जीवित रहने की बढ़ी दर
इस बीच एक सकारात्मक खबर भी सामने आई है। एम्स दिल्ली के पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. रचना सेठ के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में बच्चों में कैंसर के बाद सर्वाइवल रेट में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। यह अध्ययन द लैंसेट जर्नल हेल्थ में प्रकाशित हुआ है।
- वर्ष 2016 से 2024 के बीच देश के 20 केंद्रों में यह अध्ययन किया गया।
- इसमें 18 वर्ष तक की आयु के 5,419 कैंसर सर्वाइवर बच्चों को शामिल किया गया।
- कुल मिलाकर पांच साल की सर्वाइवल दर 94.5 प्रतिशत रही, जबकि 89.9 प्रतिशत बच्चे पूरी तरह बीमारी से मुक्त पाए गए।
- दो साल तक पोस्ट-ट्रीटमेंट फॉलोअप कराने वाले 2,266 बच्चों में पांच साल की सर्वाइवल दर 98.2 प्रतिशत दर्ज की गई।
बच्चों में कौन-कौन से कैंसर अधिक पाए जा रहे हैं?
मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक बच्चों में सबसे अधिक खतरा ल्यूकेमिया (30-35%) का देखा जाता है, जिसमें एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया सबसे आम है।
- ल्यूकेमिया एक प्रकार का ब्लड कैंसर है, जो बोन मैरो में शुरू होता है और इसमें श्वेत रक्त कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं।
- इसके बाद ब्रेन और सेंट्रल नर्वस सिस्टम के ट्यूमर बचपन में होने वाले कैंसर का दूसरा सबसे बड़ा कारण हैं, जो लगभग 20-25 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं।
- लिम्फोमा (10-15%) के मामले भी बच्चों में सामने आ रहे हैं।
- इसके अलावा हॉजकिन लिम्फोमा (12.9%), रेटिनोब्लास्टोमा (7.4%), बोन ट्यूमर (8.4%) और किडनी ट्यूमर (4.61%) जैसे कैंसर भी बच्चों में देखे जा रहे हैं।
बच्चों को कैंसर से कैसे बचाया जा सकता है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में कैंसर के जोखिम को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन सावधानी और जागरूकता से इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है।
- प्रदूषित हवा और पानी, कीटनाशकों और हानिकारक रसायनों के अत्यधिक संपर्क से बच्चों को बचाना जरूरी है।
- प्रोसेस्ड फूड से दूरी, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ वजन बनाए रखना भी जोखिम कम करता है।
- समय-समय पर स्वास्थ्य जांच और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करना बेहद जरूरी है।
- जिन बच्चों में आनुवांशिक रूप से कैंसर का खतरा होता है, उनमें विशेष जांच के जरिए समय पर निदान और इलाज संभव है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी बीमारी या उपचार से संबंधित निर्णय लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।






